लौह प्रगलक अगरिया जनजाति भारत फाउंडेशन मैनेजिंग डायरेक्टर अगरिया समाज कल्याण कोष योजना लौह प्रगलक अगरिया जनजाति भारत फाउंडेशन के तत्वाधान मे 🟨 📌 🙏 योजना का मुख्य उद्देश्य (सहयोग के बदले सहयोग)🙏 👉समाज के सदस्यों के स्वयं या परिवार के निधन की स्थिति में उनके परिजनों को आर्थिक सहायता प्रदान करना। यह योजना समाज में एकजुटता और सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक है। 🟩 📋 सदस्यता एवं नियम (संक्षेप में)🙏 योग्यता -केवल अगरिया जनजाति समाज के व्यक्तियों के लिए शुल्क - सदस्यता पूर्णतः निःशुल्क अंशदान - कुछ भी नहीं इस योजना मे लॉकिंग पीरियड- सदस्यता के 6 माह बाद सहायता हेतु पात्र 🙏अनिवार्यता🙏 सदस्य के निधन पर नॉमिनी को सहयोग देना आवश्यक 🟥 महत्वपूर्ण शर्तें एवं निरंतरता ✅ लगातार 3 सहयोग करने वाले सदस्य सक्रिय सदस्य माने जाएंगे। ❌ लगातार 2 सहयोग न करने पर सदस्यता समाप्त। 🔄 पुनः सदस्यता हेतु 3 बार अनिवार्य सहयोग आवश्यक। ⚠️ फर्जी स्क्रीनशॉट, नॉमिनी को सहयोग न करना, आत्महत्या या विवादित मृत्यु के मामलों में सहायता देय नहीं होगी। 🟦 💡 🙏 विशेष जानकारी🙏 योजना की शुरुआ...
असुर जनजाति और अगरिया जनजाति का संबंध मुख्य रूप से उनके पारंपरिक पेशे और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ा माना जाता है। 1. पारंपरिक काम (लौह धातु से संबंध) दोनों जनजातियाँ प्राचीन समय में लोहे को गलाने और बनाने का काम करती थीं। असुर जनजाति को भारत की सबसे पुरानी लौह प्रगलन (Iron Smelting) करने वाली जनजातियों में माना जाता है। अगरिया जनजाति भी जंगलों से लौह अयस्क निकालकर पारंपरिक भट्ठियों में लोहे को गलाती थी और औजार बनाती थी। इसी कारण कई इतिहासकार मानते हैं कि इन दोनों समुदायों की तकनीक और जीवन शैली में समानता रही है। 2. भौगोलिक संबंध असुर जनजाति मुख्य रूप से झारखंड और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। अगरिया जनजाति मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में रहती है। यह क्षेत्र पहले जंगल और लौह अयस्क से भरपूर थे, इसलिए दोनों समुदायों का पेशा समान विकसित हुआ। 3. सांस्कृतिक समानताएँ दोनों जनजातियों में कुछ समानताएँ मिलती हैं: प्रकृति और पूर्वजों की पूजा पारंपरिक नृत्य-गीत सामुदायिक जीवन और त्योहार जंगल और पहाड़ से जुड़ी जीवन शैली 4. अंतर भी है ह...