दिनांक - 05.06.2026 को ग्राम कुम्बा खुर्द जिला गढ़वा झारखंड मे लौह प्रगलक अगरिया जनजाति भारत फाउंडेशन के नेतृत्व मे अगरिया समाज जोड़ो अभियान का जिलास्तरीय कार्यक्रम संपन्न हुआ ll अगरिया समाज जोड़ो अभियान कार्यक्रम अंतर्गत लौह प्रगलक अगरिया जनजाति भारत फाउंडेशन द्वारा जिलों जिलों मे अगरिया जनजाति समाज के उत्थान विकास मे चलाये जा रहे कार्यक्रम अंतर्गत फाउंडेशन द्वारा प्रदाय एजेंडा का वाचन एवं शपथ ग्रहण नोडल के माध्यम से कराया जाता है अगरिया समाज जोड़ो अभियान कार्यक्रम जिला गढ़वा हेतु लौह प्रगलक अगरिया जनजाति भारत फाउंडेशन की ओर से नियुक्त नोडल श्री रामलाल अगरिया श्री बिंदु अगरिया ज़ी सोनभद्र उत्तरप्रदेश कार्यक्रम मे उपस्थित हुए ll जिनके उपस्थिति मे एजेंडा वाचन एवं शपथ ग्रहण कार्यक्रम संपन्न हुआ ll कार्यक्रम की शुरुआत अगरिया जनजाति के इष्ट देव लोहासुर पूजन के साथ हुआ इसके पश्चात उपस्थित नोडल / विशिष्ट अतिथियों का फूल माला पहनाकर स्वागत किया गया ll कार्यक्रम के प्रारम्भ मे माननीय नोडल महोदय श्री रामलाल अगरिया ज़ी को फाउंडेशन द्वारा प्रदाय एजेंडा वाचन हेतु आमंत्रित किया गया ll उनक...
असुर जनजाति और अगरिया जनजाति का संबंध मुख्य रूप से उनके पारंपरिक पेशे और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ा माना जाता है। 1. पारंपरिक काम (लौह धातु से संबंध) दोनों जनजातियाँ प्राचीन समय में लोहे को गलाने और बनाने का काम करती थीं। असुर जनजाति को भारत की सबसे पुरानी लौह प्रगलन (Iron Smelting) करने वाली जनजातियों में माना जाता है। अगरिया जनजाति भी जंगलों से लौह अयस्क निकालकर पारंपरिक भट्ठियों में लोहे को गलाती थी और औजार बनाती थी। इसी कारण कई इतिहासकार मानते हैं कि इन दोनों समुदायों की तकनीक और जीवन शैली में समानता रही है। 2. भौगोलिक संबंध असुर जनजाति मुख्य रूप से झारखंड और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। अगरिया जनजाति मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में रहती है। यह क्षेत्र पहले जंगल और लौह अयस्क से भरपूर थे, इसलिए दोनों समुदायों का पेशा समान विकसित हुआ। 3. सांस्कृतिक समानताएँ दोनों जनजातियों में कुछ समानताएँ मिलती हैं: प्रकृति और पूर्वजों की पूजा पारंपरिक नृत्य-गीत सामुदायिक जीवन और त्योहार जंगल और पहाड़ से जुड़ी जीवन शैली 4. अंतर भी है ह...