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अगरिया जनजाति से जुड़ी ख़ास बाते एवं उनका रहन सहन

अगरिया जनजाति भारत की एक विशिष्ट आदिवासी समुदाय है, जिसकी पहचान पारंपरिक लौह-प्रगलन कला, प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से रही है। अगरिया समाज की खास पहचान को समझने के लिए उसके इतिहास, रहन-सहन, खान-पान, पहनावे, देवी-देवताओं, पारंपरिक ज्ञान और सामाजिक जीवन को जानना आवश्यक है। 1. अगरिया समाज की खास पहचान:- •लौह प्रगलन की परंपरा: अगरिया समुदाय के अनेक समूह ऐतिहासिक रूप से लौह अयस्क से लोहा तैयार करने की पारंपरिक तकनीक के लिए जाने जाते हैं। •मेहनत और कौशल: पारंपरिक भट्ठी बनाना, अयस्क की पहचान करना, धातु को गलाना और लोहे को उपयोगी रूप देना विशेष तकनीकी ज्ञान की मांग करता था। •प्रकृति से जुड़ाव : जंगल, पहाड़, मिट्टी, पत्थर, वनस्पतियों और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का पारंपरिक जीवन में महत्त्व रहा है। •सांस्कृतिक विरासत: लोकगीत, लोककथाएँ, पारंपरिक पूजा, सामुदायिक आयोजन और पीढ़ियों से चला आ रहा ज्ञान सामाजिक पहचान के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। •सामुदायिक सहयोग: परिवार, रिश्तेदारी और समुदाय के लोगों के बीच सहयोग, मेल-मिलाप तथा सामूहिक कार्यक्रमों की परंपरा ...

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असुर भाग -2 असुर भाग -1 का लिंक 👇👇👇👇👇दिया हैं जरूर पढ़े 👇👇👇👇👇👇👇👇👇 असुर भाग -1 का लिंक http://www.agariyajanjati.in/2021/04/asur-asur-wikipidia.html यह सत्य बात हैं की असुरो तथा लोहे के मध्य गहरा और करीबी सम्बन्ध नहीं रहा हैं परन्तु थोड़ा बहुत सम्बन्ध तो हैं ही ll श्री राय हमें बताते हैं की क़िस प्रकार मुंडा समुदाय के लिए प्राचीन भयानक लम्बे चौड़े असुरो को पुंडी या सफेद रंग के लोगो को भव्य, बालिष्ठ तथा चंचल बताया गया हैं l जो की सिर्फ एक रात मे लम्बे लम्बे डग भरकर सैकड़ो मील दूसरे गांव मे नृत्य मे भाग लेकर, सुबह होने से पहले वापस अपने घर लौट आते थे ll ऐसा कहा जाता हैं की वे ईंटो से बने बड़े भव्य मकानों मे रहा करते थे तथा अधिकांश समय ताम्बा या लोहा बनाने मे व्यस्त रहा करते थे और परंपरा यहाँ तक बतलाती हैं की वे लोहा खाते थे और अपनी तेज फूंक से आग आग प्रज्वलित कर लिया करते थे ll इस प्रकार लोहा खाने की शक्ति पहले अगरिया चारित्रिक विशेषता थी ll इस प्रकार आगयुक्त अनेको प्रकार के खाने तथा उनके विशर्जन की अनेको तथा किवदान्तियो मे वर्णित की गयी हैं ll इसके विपरीत ...