अगरिया जनजाति भारत की एक विशिष्ट आदिवासी समुदाय है, जिसकी पहचान पारंपरिक लौह-प्रगलन कला, प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से रही है। अगरिया समाज की खास पहचान को समझने के लिए उसके इतिहास, रहन-सहन, खान-पान, पहनावे, देवी-देवताओं, पारंपरिक ज्ञान और सामाजिक जीवन को जानना आवश्यक है। 1. अगरिया समाज की खास पहचान:- •लौह प्रगलन की परंपरा: अगरिया समुदाय के अनेक समूह ऐतिहासिक रूप से लौह अयस्क से लोहा तैयार करने की पारंपरिक तकनीक के लिए जाने जाते हैं। •मेहनत और कौशल: पारंपरिक भट्ठी बनाना, अयस्क की पहचान करना, धातु को गलाना और लोहे को उपयोगी रूप देना विशेष तकनीकी ज्ञान की मांग करता था। •प्रकृति से जुड़ाव : जंगल, पहाड़, मिट्टी, पत्थर, वनस्पतियों और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का पारंपरिक जीवन में महत्त्व रहा है। •सांस्कृतिक विरासत: लोकगीत, लोककथाएँ, पारंपरिक पूजा, सामुदायिक आयोजन और पीढ़ियों से चला आ रहा ज्ञान सामाजिक पहचान के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। •सामुदायिक सहयोग: परिवार, रिश्तेदारी और समुदाय के लोगों के बीच सहयोग, मेल-मिलाप तथा सामूहिक कार्यक्रमों की परंपरा ...
असुर भाग -१ समुद्र मंथन के प्रारम्भ से देवताओ व दानवो के मध्य लम्बे समय समय तक चले आ रहे घमासान युद्ध को महाभारत में बहुत सुन्दर तरीके से चित्रित किया गया है इस महाकाव्य में बहुत सुन्दर तरीके से बताया गया है की किस प्रकार सर्प को रज्जु बनाकर तब तक समुद्र मंथन किया गया जब तक उसमे से मंथन के कारन अनेक शुभ सुन्दर उपयोगी वस्तु न निकल आये जिन्हे ललचाई दृष्टि से देवता लोग हड़प जाना चाहते थे। इस प्रक्रिया और दानव एक दुसरे के सामने थे। चंद्र और अमृत घट पाने के लिए देवताओ और दानवो के मध्य विकराल संग्राम हुआ। तभी भगवान् विष्णु ने मायावी रूप धार कर दानवो को भ्रमित कर दिया और दानव हताशा में देखते रहे की समुद्र से बहुमूल्य निकलकर उनके पास से जा रही है। ऐसी बीच दानवो के मध्य असुर राहू ने अमृत घट की कुछ बूंदो का स्वाद पान कर लिया है और इसके पहले की वह उन बूंदो को गटक पाता ,नारायण ने उसकी गर्दन धड़ दी। राहु का सर एक तेज ध्वनि के साथ आकाश मे उड़ गया और भीषण गर्जना के साथ उसका धड ज़मीन पर गिरा जिससे पृथ्वी के सारे जंगल और पहाड़ काँप उठे l परन्...