अगरिया समाज जोड़ो अभियान कार्यक्रम जो लौह प्रगलक अगरिया जनजाति भारत फाउंडेशन से जुड़े सभी राज्यों के जिलों मे संपन्न कराया जाता है ll दिनांक 19 अप्रैल 2026 को जिला रायगढ़ के ग्राम सरईपाली मे सफलता पूर्वक संपन्न हुआ ll जिला रायगढ़ समिति एवं जिलाध्यक्ष श्री उबरन अगरिया जिनके सफल आयोजन से कार्यक्रम सम्पन्न हुआ ll जिला रायगढ़ छत्तीसगढ़ अगरिया समाज जोड़ो अभियान कार्यक्रम हेतु लौह प्रगलक अगरिया भारत फाउंडेशन की ओर से नोडल / मुख्य अतिथि के रूप मे श्री अन्नू अगरिया एवं श्री गजपति अगरिया की नियुक्ति हुई थी जिनको कार्यक्रम मे उपस्थित होकर अपने कुशल नेतृत्व मे कार्यक्रम का सफल आयोजन संपन्न कराना था लेकिन दोनों नोडल के घर एक ही समय मे शादी लगन कार्यक्रम होने के वजह से दोनों नोडल उपस्थित नहीं हो पाए, दोनों नोडल की अनुपस्थिति मे रायगढ़ जिला के जिलाध्यक्ष श्री उबरन अगरिया ज़ी को ही नोडल का दायित्व फाउंडेशन द्वारा दिया गया जिनके कुशल नेतृत्व मे अगरिया समाज जोड़ो अभियान कार्यक्रम रायगढ़ जिला मे संपन्न हुआ ll अगरिया समाज जोड़ो अभियान कार्यक्रम जहाँ आज लौह प्रगलक अगरिया जनजाति भारत फाउंडेशन के...
अगरिया जनजाति के देवता कौन है। अगरिया जनजाति के देवता लोहासुर
लोहासुर देवता के बारे में (अगरिया जनजाति का प्रमुख देवता)
लोहासुर के सम्बन्ध में कई कहावत है कई महान वैज्ञानिको ने अपने लेख में लिखे है जिनमे से मै यहाँ दो।
प्रमुख कहानियो को प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हु। तो आइये जानते है लोहासुर कौन है -
भाग-१
दोस्तों अगरिया आदिवासी समुदाय में लोहासुर का प्रमुख स्थान है अगरिया आदिवासी समुदाय लोहासुर को अपना देवता मानते है। यदि आप अपने क्षेत्र में अगरिया आदिवासी को जानते है तो पूछियेगा वो लोहासुर को अपना प्रमुख आराध्य देवता मानते है मुर्गी सूअर इत्यादि की बलि भी देते है।
तो आइये जानते है लोहासुर कौन है और अगरिया आदिवासी के प्रमुख देवता के रूप में कैसे जाने जाते है।
दोस्तों इसके सम्बन्ध में कहानी किवदंती है जो मै आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हु -
एक बार करिया कुंवर अपनी भट्ठी धौक रहा था तभी उसने अपने धौकनी में से एक रोते हुए बच्चे की आवाज सुनी। उसने अपना पांचा भट्ठी में डाला और बच्चे को बाहर निकाला। बच्चा तपती आग की तरह गर्म था ,अतः करिया कुंवर बच्चे को पकड़ नहीं पाया। करिया कुंवर ने बच्चे से पूछा -तुम कुछ खाओगे या पियोगे ,बच्चे ने कहा -हां मै तुम्हारे सबसे बड़े लड़के को खाऊंगा।
यह सुनकर करिया कुंवर कहता है नहीं ,मै तुम्हे उसे नहीं दूंगा -
यह सुनकर बच्चा आगबबूला हो गया। वह खड़ा हो गया और बोला -मेरा नाम लोहासुर है। मुझे खाने के लिए काली गाय लाकर दो नहीं तो मई तुम्हारे सारे बेटो को खा जाउगा। करिया कुंवर भाग कर जानवरो के बाड़े में गया और एक काली गाय लेकर आया। फिर लोहासुर ने कहा -अब तुम मुझे रहने के लिए कोई जगह दो। करिया कुंवर गुस्से में था इसलिए बोले वही तुम्हारी जगह है जहा से तुम आये हो `, जैसे ही करिया कुंवर ने ऐसा कहा ,लोहासुर वह से अंतरध्यान हो गया।
करिया कुंवर ने काली गाय भट्ठी से बाँध दी और थोड़ी देर बीड़ी पीने तथा अपने साथियो के साथ गपसप मारने चला गया। जब लौटा तो उसने देखा की बिना सर की काली गाय भट्ठी से बंधी पड़ी है यह देखकर करिया कुंवर बहुत भय भीत हो गया। उसने गाय को एक लकड़ी मारी जिससे खून बहने लगा। करिया कुंवर ने अपनी दाए हाथ की चौथी अंगुली से थोड़ा खून लगाया और अपने माथे पर खून का टीका लगाया तथा थोड़ा सा खून भट्ठी पर छिड़का। फिर उसने गाय को जमीन में दफना दिया।
यह कहानी करंजिया क्षेत्र की दलदल से प्राप्त यह स्थापित करती है की लोहासुर के सम्मान में गाय की बलि चढ़ाई गयी थी। अब अगर वर्तमान में कहे तो बलि में बदलाव आया है कही कही सुवर ,मुर्गी इत्यादि की बलि चढ़ाई जाती है।
भाग -२
आइये अब लोहासुर के सम्बन्ध में दूसरी प्रचलित कहानी पर बात करते है।
जब लोहासुर का जन्म भट्ठी से हुआ था तो वह बच्चे की तरह रोया था पर कोई समझ नहीं पाया था की आखिर बात क्या है -बारहो अगरिया भाई कोयले का धुंवा पीकर बेहोश पड़े थे। उस समय लोहासुर कांव कांव चिल्ला रहा था पर कोई उसकी बात समझ नहीं पा रहा था। इस पर लोहासुर नाराज होकर जहा कोदो का ढेर बिछा हुआ था वह वाहा जाकर खेलने लगा। तभी एक बूढ़ी गोडिन सिर पर छांछ का मटका लिए वहा गुजरी। उसने देखा की लोहासुर कोदो के ढेर पर खेल रहा है वह अगरिया भाइयो के पास गयी तथा नशे में पड़े सभी भाइयो को थोड़ा थोड़ा मठा पिलाया और जब वे होश में आये तो उसने सब भाइयो से कहा -उठो लोहासुर का जन्म हो गया है। आओ ,जल्दी से एक काली गाय लाओ और भट्ठी से बांध दो तथा अपनी भट्ठिओ को भूसे से भर दो और जोर जोर से चिल्लाओ :आओ लोहासुर भवानी। मै आपको भोजन देता हु। मै आपको रहने का जगह देता हु। आप कृपया यहाँ पधारे और यहाँ रहे। यदि तुम सब लोग मिलकर ऐसा कहोगे तो ही लोहासुर यहाँ आएगा ,ऐसी बूढ़ी औरत बोली।
सभी अगरिया भाइयो ने ऐसा ही किया तब लोहासुर आया और भट्ठी के कोदो बैठ गया। अगरिया भाइयो ने काली गाय की बलि की चढ़ाई ,और उसके खून को अपने माथे पर लगाए और भट्ठी पर भी चढ़ाया।
इस कहानी में विशेष रूप से जो कोदो के भूसे का उल्लेख किया गया है महत्त्व आपको आगे स्पष्ट किया गया है जो मंडला जिले के करंजिया क्षेत्र के दादर गांव से प्राप्त हुई थी
बारह अगरिया भाइयो ने भट्ठी में लौह युक्त पत्थर भर दिए तथा आठ दिन नौ रात तक उस भट्ठी में आग जलाये रखी। परन्तु लोहा बनकर बाहर नहीं आया। बनने वाला पिघला लोहा गुप्त रूप से बहकर कोदो के भूसे के ढेर के साथ खेलने चला जाता था। तभी वहा एक बूढी औरत आयी और इन अगरिया भाइयो से बोली -मेरे बच्चो क्या कर रहे हो -लोहा तो बनकर निकल रहा है और कोदो के भूसे के ढेर के साथ खेल रहा है। यह बात सुनकर सभी भाइयो ने उस बूढी औरत का मजाक उड़ाया। पर बार बार वह यही दोहराती रही -नहीं नहीं वह वह कोदो के ढेर पर टहल रहा है। अंततः एक भाई ने वह जाकर देखा तो पाया की लोहासुर वाकई भूसे के ढेर पर खेल रहा है। उस भाई ने लोहासुर को उठाया परन्तु उसका हाथ टूट गया। उसके बात सरे भाई वह गये और किसी तरह लोहासुर को भट्ठी में रखा ,पर थोड़ी लोहासुर फिर उसमे से निकल कर भूसे के ढेर के साथ खेलने लगा।
फिर लोहासुर सपने में आया और बोला -तुम लोग अपनी भट्ठी में कोदो रखने की जगह बनाओ ताकि मै वहा आराम से बैठ सकू। उन लोगो ने वैसा ही किया तब कही जाकर लोहासुर वहा बैठा। लोहासुर कुंवारी कोदो के भूसे से शादी करना चाहता था और उसके प्रति प्रेम के कारन ही वह कोदो के भूसे के ढेर पर खेलने जाया करता था। इसलिए आज तक यदि भट्ठी में ठीक से कोदो के भूसे को नहीं जमाया जाय तो लोहा ठीक से नहीं निकलता है।
यहाँ इस कहानी को आधार मानकर लोहा गलाने की तकनीक को रोचक विवरण दिया गया है लोहा बनाने के पूर्व भट्ठी में उपयुक्त आधार होना चाहिए ,जिस पर लौह युक्त पत्थर अच्छी तरह रखा सके। चुकी कोदो का भूसा बहुत चिकना होता है ,अतः इस प्रकार के कार्य करने के लिए उपयुक्त होता है।
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