🔥 ⛏️ अगरिया जनजाति: भारत की प्राचीन लौह वैज्ञानिक एवं आदिम आदिवासी विरासत ⛏️🔥 🙏 सेवा जोहार साथियों! अगरिया जनजाति भारत की एक प्राचीन, वैज्ञानिक एवं गौरवशाली आदिम आदिवासी जनजाति है, जो मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के डिंडोरी, मंडला, अनूपपुर, शहडोल, उमरिया, सीधी एवं सिंगरौली जिलों सहित छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश के सोनभद्र क्षेत्र में निवास करती है। "अगरिया" शब्द की उत्पत्ति "आग" अथवा "अग्नि" से मानी जाती है, क्योंकि इस समाज का जीवन, संस्कृति और परंपराएँ आग की भट्टी तथा लोहे के इर्द-गिर्द विकसित हुई हैं। ⚒️ भारत के प्राचीन लौह शिल्पकार अगरिया समाज को भारत के सबसे प्राचीन धातुकार समुदायों में गिना जाता है। हमारे पूर्वज जंगलों और पहाड़ियों से लौह अयस्क एकत्रित कर मिट्टी की पारंपरिक भट्टियों एवं लकड़ी की धौंकनी (फुकनी) की सहायता से शुद्ध लोहा तैयार करते थे। 🔸 हल का फाल 🔸 कुल्हाड़ी 🔸 हांसिया 🔸 कृषि एवं दैनिक उपयोग के अनेक औजार इनके द्वारा निर्मित औजार अपनी मजबूती और टिकाऊपन के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। 🔥 लोहासुर देव: हमारे आराध्य अगरिया समाज के प्रमुख द...
लोहे का प्रयोग आज आम बात हैं लोहे की चीजें हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई हैं ll लोहे का प्रयोग लगभग 3000 साल पहले सुरु हुआ ll जहाँ ऐसा प्रमाण मिलता हैं की अगरिया आदिवासी द्वारा लौह अयस्क से लोहा प्रगलित किया जाता था और बड़े बड़े वैज्ञानिक जैसे एलविन आदि कई वैज्ञानिको ने इस बात की पुष्टि किये हैं ll अगरिया जनजाति द्वारा लोहे पर कार्य किये जाने के कारण लोहार कहा गया जो आज भी कही कही वही बात सुनने को मिलता हैं ll महापाषाण कब्रों मे लोहे के औजार और हथियार बड़ी संख्या मे पूर्व मे मिले हैं ll करीब 2500वर्ष पहले लोहे के औजारों के बढ़ते उपयोग का प्रमाण मिलता हैं ll इनमें जंगलो एवं लकड़ी की कटाई करने के लिए कुल्हाड़ी और जुताई के लिए हलों के फाल शामिल हैं ऐसा माना जाता हैं की लोहे के फाल से क़ृषि उत्पादन बढ़ गया ll क़ृषि उत्पादन मे लोहे का महत्व :- लोहे के उत्पादन या प्रगलन से लोहे के उपयोग से क़ृषि क्षेत्र मे बड़े परिवर्तन आये हल के फाल जब लोहे के बनने लगे तो कठोर ज़मीन को लकड़ी की फाल की तुलना मे लोहे के फाल से आसानी से जोता जा सकता था ll इससे फसलो की उपज बढ़ गयी ll दूसरे, लोगो ने धान के पौधों का...